Wednesday, February 18, 2015

कभी पुकारोगे हमें



जब भी नज्मों में आपकी हम ढलते है
बनकर खुशबू सहरा में हम बिखरते है ।

उड़ा  ले न जाए आँधियाँ ये धूल भरी
सीप बन तेरी आगोश में छुपे रहते है ।

जब  थामती है सागर सी बाँहें मुझको
कतरा- कतरा  तुझमे कहीं पिघलते है ।

छोड़ जायेंगे अपने कदमो के निशान
तपती रेत पर नंगे  पाँव  हम चलते है ।

एक बार मुड़कर कभी पुकारोगे हमें
आस ये ही लिए राहों  में ख़ड़े  रहते है ।



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