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** हेलो जिन्दगी * * तुझसे हूँ रु-ब-रु * * ले चल जहां * *

Tuesday, August 27, 2013

चीरहरण






लगी न बाजी
हुयी न जीत हार

फिर क्यूँ भोगती चीरहरण

सीता और द्रौपदी आज  …।?


पावन वृन्दावन
क्यूँ बन रहा चौपाल
दु:शासन  लीलायें
देख रहा धृतरास्ट्र

गांडीव गदा सब
क्यूँ मौन है आज
हे पार्थ सारथी
रथ हांके कौन दिशा

कहा था तुमने 

 होगी  हानि धर्म की जब जब
लूँगा अवतरण में तब तब

क्यूँ भूले वचन तुम 



हे दौपदी सखा 

कहाँ  छुपाया चक्र सुदर्शन

छेड़ते क्यूँ नही

मेघमल्हार या दीपक राग 


डुबो दो अब पाप की नैया

धर्म  दीपक फिर से जला दो

आओ तुम हे मुरलीमनोहर

प्रेम की वंशी फिर से बजा दो 

Friday, May 24, 2013

एक मुट्ठी धुप





बिखरने दो
एक मुट्ठी धुप
आँगन में मेरे
छाँव की कालिमा
अब  सही नहीं जाती


खिलने दो
खुशियों के फूल
बगिया में मेरे
झरते पत्तो  की जुदाई
अब सही नही जाती

दर्द के नग्मे



ना सुना दर्द के नग्मे हमे 

जिन्द्गी अब रास आती नही 

मौत कहे तु चल मेरे सँग 

पर शर्त है एक बार मुस्कराने की

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