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** हेलो जिन्दगी * * तुझसे हूँ रु-ब-रु * * ले चल जहां * *
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Wednesday, May 2, 2018

हर तरफ शोर है




शोर ,शोर ,शोर 

हर तरफ शोर है 
आरती का शोर 
अजान का शोर 
देश भक्ति का शोर 
देश द्रोह का शोर 
धर्म का शोर 
जातियों का शोर 
प्रीत का शोर 
रीत का शोर
फागुन में उड़ते गुलाल का शोर
राहों में उड़ते गुबार का शोर 
कभी कुछ पल जब अकेली बैठती हूँ 
तो अपने ही आकांक्षाओं और 
लालसाओं का शोर 
कितने आदि हो गए है हम इस शोर के 
सोचती हूँ कभी जब वाकई शान्ति होगी 
तो कहीं हम उस शांति के शोर से 
पागल तो नही हो जाएंगे ???
-- सुनीता अग्रवाल "नेह"

Thursday, August 17, 2017

कहो न सखी



कहो न सखी

**************
कहो न सखी
क्या कह रही है पायल तेरी
क्या गुन रही है चूड़ियां तेरी
कहो न सखी .........
ईंटो पर ईंटे जमाती
चल पड़ी हो चाल साधती
गा रही है ये प्रणय गीत
या विरह काव्य है रच रही
कहो न सखी .........
गिट्टियों से सुर मिलाती
बज रही है ये खनखनाती
प्रिय की है ये प्रीत भेंट
या की है बेड़ियाँ डली
कहो न सखी ..........
थक के जब ये चूर होती
मीत की सलवट मिटाती
खोलती है लाज के पट
या मन ही मन है सिसकती
कहो न सखी ............

Tuesday, March 14, 2017

अबकी होली में

तरसे नैना दिन रात अबकी होली में
रही पिया मिलन की आस अबकी होली में
साजन कर रहे लन्दन का दौरा
नेटवर्क बना मिलन बीच रोड़ा
मैं ठहरी निपट गवाँर
कोई लिख दो उनको तार अबकी होली में
पड़ोसन हमारी बड़ी जालिम गुजरिया
मोरे सैया को रँगे भर पिचकारिया
ये रँग न मुझको भाये
कोई कह दो उसे समझाये अबकी होली में
मोहल्ले के चचा बिरज के वासी
कबर में पाँव उम्र है अस्सी
नाम है कृष्ण मुरारी
लगे राधा उसे हर नारी अबकी होली में


Tuesday, February 14, 2017

ये सैलाब आँखों में जलता बहुत है


मिलने को तुमसे मचलता बहुत है 
ये सैलाब आँखों में जलता बहुत है 

ढुलके तो तुम पर ये कर दे न जाहिर 
दिल पे इख्तियार अब भी तुम्हारा बहुत है 

Friday, February 10, 2017

इन्तजार


इन्तजार की घड़ियां इतनी दुखदायी न थी ,
मिलन की आरजू इस कदर परायी न थी ,
ये कौन सी राह पर चल पड़ा ऐ !दिल बता ,
तन्हाईयों में भी इस कदर तन्हाई न थी । 

Friday, January 6, 2017

आओ शर्म करें

चित्र गूगल से साभार


आओ फिर शर्म करे
सभ्य होने अदा रस्म करें
किसी ने कहा "कपड़ो का ख्याल रखो"
किसी ने "शाम होने के बाद घर से न निकलो"
किसी ने कहा "पुरुष मित्र न बनाओ "
किसी ने शराब न पीने की सलाह दी
कारण??
सबने एक सुर में कहा पुरुष जानवर होते है
मौका देख फायदा उठाते है
नोचते खसोटते है
तो आओ न फिर  शर्म करें
सभ्य होने पर शर्म करें
शर्म करें की हम पुरुषो को सभ्य  नही बना पाये ?
सुनो गुड़िया -
खिड़कियां खोल दो आने दो थोड़ी धूप
मुँह  न छिपाओ
अपनी पवित्रता को केवल यौनागों तक सीमित न करो
अपने चरित्र को इस सभ्य समाज का खिलौना न बनाओ
तुम आज भी वृंदा हो
पावन तुलसी...
ये वरदान तुम्हे स्वयं को स्वयं ही देना होगा
यहाँ तो केवल मूरत है माटी की मूरत
या कठपुतलियाँ है
जो बचे है वो ये ही जानवर है
 इनसे कैसा प्रमाण पत्र लेना
इन्हें तो अभी इन्सान होना भी नही आया
ना ही ये पूर्णतया जानवर है
आओ शर्म करें गुड़िया
मिल कर शर्म करें
इनको हम सभ्य नही बना पाए
उठो गुड़िया। 

Tuesday, December 27, 2016

उन तक पहुंचेगी सदा मेरी


1) 
टेढ़े  है रस्ते लगेगी जरा देरी
उन तक पहुंचेगी सदा मेरी ।
वो जो जीते रहे तुम्हे देख कर
उनको मार डालेगी खता तेरी ।
2)

कुछ पल तुझसे  बतला   लूँ तो चलूँ
तस्वीर  नयनो में बसा  लूँ तो चलूँ
कहते थे मुझको कभी जो  जिंदगी
जिन्दा हूँ अब तक बता दूँ तो चलूँ 

Thursday, December 8, 2016

आज का दिन ...


फिर बीत गया
आज का दिन ...
कुछ अनकही बातों के साथ
कुछ बिसरी यादों के साथ
कुछ मीठे ख्यालो के साथ
कुछ अनसुलझे सवालों के साथ
कुछ इन्तजार के साथ
कुछ उम्मीदों के साथ
फिर बीत गया
आज का दिन ।
*नेह सुनीता*

Sunday, November 20, 2016

बेवफा

बेवफा
__________
सोनम गुप्ता बेवफा है
सोनम गुप्ता तुम बेवफा हो
ये तुमने ठीक नही किया
तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए था
तुम्हे ऐसा करने का कोई अधिकार ही नही था
उफ्फ्फ
तुमने अमर प्रेम को कलंकित कर दिया
नहीं नहीं---
अब कोई सफाई नही --
कोई सुनवाई नही होगी अब --
सोनवीर ने कह दिया तुम बेवफा हो तो हो ।
सदियो से यही होता आया है
सोनम मजबूरियाँ बता कर बेवफाई कर जाती हैं
और बेचारा सोनवीर ....
वो कभी बेवफा नही होता
बस
कभी थोड़ा नजर सेंक लेता है
कभी फूलों पर थोड़ा मँडरा लेता है
कभी स्वाद बदलने के लिए बाहर की बिरयानी खा आता है
आज्ञाकारी पूत बन कर मज़बूरी में किसी और से व्याह रच लेता है
पर बेवफाई नही करता
कभी नहीं
इन सबके बाबजूद
आसमान के इस छोर से लेकर उस छोर तक
वह बस सिर्फ और सिर्फ तुम्हे चाहता  है
देखो तुम्हारी बेवफाई ने क्या हाल कर  दिया उसका
ओह्ह
दिल दिमाग बेकाबू हो गया है
कभी ग़मगीन शायरी में
कभी हाथ की नसे काट कर
कभी सूसाइड नोट पर
और  कभी
करेंसी पर
तुम्हारा नाम लिख लिख कर
अपनी वफ़ा का सबूत दिखा दिखा
अपने सच्चे पवित्र प्यार का परचम लहरा  रहा है
 देखो सोनम गुप्ता
अपने प्यार को उसने अमर कर दिया
तुम्हारे नाम को अमर दिया
क्या  कहा ?
उसने तुम्हे बदनाम कर दिया ?
तुम्हारे प्यार का मजाक बना दिया ?
कही मुँह छुपाने लायक नही छोड़ा ?
नहीं नहीं सोनम गुप्ता
ये तो उसके सच्चे प्रेम की पराकाष्ठा है
उसने सच्चे प्रेमी होने की निशानी है
बेवफा तो तुम हो सोनम गुप्ता।
 .... तुम
क्योंकि तुमने परिवार की खातिर ,
अपने प्यार की जान की  सलामती की खातिर
उस से मुँह मोड़ लिया
ये तुमने अच्छा नही किया
सोनम गुप्ता
जमाना तुम्हारी बेवफाई को कभी माफ़ नही करेगा
सोनम गुप्ता
_________________________________________
अगर वास्तव में कोई सोनम गुप्ता और सोनवीर सिंह है तो उनसे माफ़ी सहित ___/\__


Thursday, July 7, 2016

यूँ ही चलते चलते .... दो लाइन (१)



यूँ ही चलते चलते  .... दो लाइन
___________________________
१)
नजर तुझसे हटती नहीं नजारों का क्या करूँ
तुझसे ही आबाद जिंदगी बहारों का करूँ  ।
********************************
२)
लानतों मलालतो का दौर है थोड़ा और चलने दो
ये खुशबू  है प्यार की खुलकर बिखरने दो  ।
*********************************
३)
मेरी मैय्यत पर  जब आना थोड़ी मुस्कान ले आना ,
अच्छा नहीं होता मुर्दे की खातिर फूलों को सजा  देना  ।
************************************
४)
सुना है तन्हाईयाँ ,रुस्वाइयाँ ,बेवफाईयाँ ,सौगाते है इश्क की ,
छोडो सनम माफ़ करो  ये इश्क नहीं मुझ गरीब के बस की ।
*************************************

Saturday, June 18, 2016

आखिरी निशानी



जान से ज्यादा सम्हाल रखा है
 मोहब्बत की वो आखिरी निशानी
वो तेरे फेंके पत्थर और टुकड़े मेरे दिल के
उतनी ही मोहब्बत है उनसे जितनी तुमसे । 

Thursday, March 10, 2016

नज्म


 शाम का धुंधलका
प्रार्थना ,अजान के स्वर
घर लौटते पंछियो के कलरव
मृदु हवाओ के संगीत की धुन पर
कहीं सज जाती है महफ़िल
मदमस्त कातिल शोखियां
दिलकश अदाओं के  मुखौटे के पीछे
टूटन ,वेदना ,चीत्कार
मजबूरियां,प्रताड़नाएं
बन जाती है नज्म
गुनगुनाती नज्म
सूखे अश्रुकण
बन जाते है थिरकन
मदहोश थिरकन
दूर  कहीं
बुझते दिए के साथ
खुशबु लुटाते
झरने लगते है
हरश्रृंगार ।


Monday, February 22, 2016

अभिव्यक्ति की आजादी



जिस भारत की बर्बादी के तुमने लगाये नारे
अभिव्यक्ति की ये आजादी तुझको दी इसी ने प्यारे

"कितने सैनिक मारोगे ,घर घर से सैनिक निकलेंगे
दुश्मन तेरी बर्बादी तक हम लड़ेंगे हम कटेंगे
है अगर देश के लिए अभिमान मन में प्यारे
जाकर सीमा पर लगाओ  फिर अब तुम ये नारे

धब्बे तुम्हारे दामन के यूँ  ही नही मिटेंगे
कतरे  तेरे लहू के जब तक देश को न सींचेंगे ।
*सुनीता अग्रवाल (नेह) *
देश की बर्बादी के नारे लगाने वाले अब jnu में शरण लिए हुए है अभी तक न तो उन्होंने आत्म समर्पण किया है न पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर पायी है । अजीब बात । आखिर क्यों विश्वविद्यालय उन्हें बचाना चाहता है। .अगर उन्होंने कोई गलत काम नहींकिया तो डरने की क्या आवश्यकता है ?क्यों नही अपनी बेगुनाही का सबूत देते है ? और विश्वविद्यालय शिक्षक संघ फिर कन्हैया को छुड़ाने के लिए तत्पर क्यों नही दीखते ? हद है बौद्धिकता की ।

Thursday, February 18, 2016

हे भारती कर दो क्षमा ...

पहले jnu तदोपरांत जादवपुर विश्वविद्यालय में जो कुछ घटित हुआ वो बेहद शर्मनाक है अपने ही देश  के खिलाफ नारे लगाना। ये किस दिशा में चल पड़ी है ये नयी पढ़ी लिखी पीढ़ी। ये कैसी आग लगा रहे  है सियासतदार अपने ही देश में। अफ़सोस जनक होने के साथ विचारणीय मुद्दा है ये आखिर युवाओं में ये भावना क्यों कैसे पनपी इन पे गहराई से अध्ययन करना होगा वरना ये आग नई फसलो को निगल  जाएगी ,,,,
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क्षमस्व क्षमस्व हे भारती  कर दो क्षमा ...

वन्दे मातरम ,जय हिन्द का नारा जहाँ  गूंजता घर घर में
आतंकियों का महिमामंडन अब हो रहा उस भारत वर्ष  में ।

सत्य अहिंसा और प्रेम की  बहती थी रसधार जहाँ
बहा दिया नफरत का दरिया भारती तेरे ही लालो  ने ।

वीरो ने  जान गँवा  दी जिस  माँ की लाज बचाने को
मंडी  में पहुचा दिया उसको आजादी के दल्लो ने ।

भगत ,सुभाष, गाँधी की मूर्ति सडको पर है लगी हुयी
चोर ,लुटेरे ,आतंकी अब पूजित हो रहे मदिर में ।

शस्य श्यामला भूमि ये जाति ,धर्म में बंट गयी
वोटो के व्यापारियों ने  आग लगा दी फसलो में ।

क्षमस्व क्षमस्व हे भारती  कर दो क्षमा ...



Wednesday, September 9, 2015

बदल गया है दिल मेरे शहर का …।


बदल गया है  दिल मेरे  शहर  का   …।
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मेरा शहर
ट्रेफिक से लदी -फदी
चिल्ल्पों करती
गालियां बचपन की
रेड लाइट -स्टॉप
येलो लाइट -बी रेडी
ग्रीन लाइट -गो
से  अनजान
आगे निकलने की होड़ में
टकराते लोग
सुसंस्कृत भाषा में
माँ , बहन के रिश्तो से
एक दूजे को नवाजते लोग
बढ़ती जो बात
बातों -बातों में
जूतम पैजार
किरिया करम
अगली पिछली पीढ़ियों का
करते लोग
अचानक स्फूर्त
अभी तक  जो
उठा रहे लुफ्त
थोड़ा ठहर
गुजरते लोग
बीच बचाव करते
कभी इस पर
कभी उस पर
हाथ आजमाते
शांति ,शान्ति का नारा  लगा
चिचियाते लोग
 सुलह का सेहरा
हर कोई धरे माथे
एक दूजे को गले
मिलवाते लोग
नहीं मिले -
संवेदनाओ से भरे
वे  संकीर्ण पथ
अब हो  गए है चौड़े
सुन्दर पुलों से आवृत
 दिखते है अब
एक दूजे अनजान
 क्षण क्षण को थामे
अपनी हो धुन में
भागते लोग
बरसो बाद जो मिली
लगने लगा है बदला बदला
मेरा शहर
हाँ बदल गया है साथ ही
 दिल शहर  का   …।

   









Sunday, July 19, 2015

काल कोठरी



कालकोठरी
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जाने क्यों खोल आई थी
काल कोठरी की
जंग लगी जंजीरों को
थरथराने लगी है
सजायाफ्ता अभिलाषायें
बाहर की दम घोटू हवा
इन्हे रास नही आती
रौशनी तन जलाती  है
फांसी के इन्तजार में कटती जिंदगी को
 तड़पती मौत की सजा दे आई हूँ




Sunday, April 26, 2015

लक्ष्मी


प्रिय सखी अद्भुत सृजनशीलता की क्षमता से परिपूर्ण कलाकारा   "चंचला इंचलकर सोनी " जी की एक पेंटिंग पर मेरे कुछ भाव
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ललाई युक्त नन्हे पांव
जब उतरे प्रागण में
 भोर की ललिमा ने स्याह हुए अम्बर को
फिर से लौटा दिया उसका रंग
चिड़ियों की चहचहाट से मुकाबिला करती
आरती की सुमधुर घण्टियों सी
पूरे  घर को तरंगित करती
बचपन से ही नजरो की परिधि में पलती  बढ़ती
संस्कार के बीजो को आत्मसात  करती
जब- जब सपनो के इन्द्रधनुष पर
उन ललाई लिए कोमल पांवो से  चलने  की कोशिश करती
तब तब सूरज आकर समेट रख देता  इन्द्रधनुष
की कहीं लक्ष्मी में पैरो की ललाई काली न हो जाये
उसके सपने चोरी न हो जाये
छुपा  देता उसे दुनिया की नजरो से दूर
तिजोरी में कैद करके
की इंद्रा धनुष की पालकी बना कर
उसके सपनो की  झालरों से सजा कर
गोधूलि में भेजेगा उसे अंबर पर बने चाँद के  घर
जहाँ  चांदनी बन कर एक छत्र राज करेगी
वो धरा अंबर पर
फिर एक एक सपने को चमका चमका कर
टाँकती जाएगी अंबर पर
बड़ी खुश होती  वो ये सुन कर सोच कर
और जतन  से बचाये रखना चाहती ललाई
और उकेरने लगती सपनो को
हथेलियों में हिना से
सुना है उसने हिना का रंग जितना सुर्ख होगा
अंबर पर बने चाँद के घर में
उसके सपने उतनी जल्दी साकार होंगे
आखिर विदा होती है वो
पैरो में माहवार ,माथे पर बिंदिया
और हाथो में रचे अपने सुर्ख सपनो के साथ
इंद्रधनुषी पालकी में
हाँ ! पा लिया चाँद को !!
अम्बर भी उसकी उसकी मुट्ठी में है !!
पर उसके सपनो को समेटे
 उसकी मेहँदी का रंग
फीका होने लगा है
चाँद के सपने को चमका चमका कर
अंबर पर टाँकते टाँकते
हाँ ! आज भी वो लक्ष्मी है
उसके पैरो में लगे आलता  का रंग फीका न पड़
इसलिए छुपा के रख देता है चाँद
उसे ड्योढ़ी के भीतर
प्रथाओं की तिजोरी में ।












Saturday, April 25, 2015

प्रीत का मंदिर


संजो के रख लिए
मन के पन्नो पर
गाहे -बेगाहे कहे गए
सच्चे या की झुटे
वो प्रीत पगे शब्द
उन्हें जोड़ जोड़
बनाती रहती हूँ
 प्रीत का मंदिर
कभी फुर्सत हो तो आना
मेरे इस मंदिर में
तुम्हारे चरणो की वाट  जोह रही है ये
प्राण प्रतिष्ठा कर जाना

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