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Sunday, March 12, 2017

रंग उल्लास





होली.... सर्दी की विदाई और गर्मी के स्वागत का त्यौहार । जब प्रकृति भी आलस त्याग उल्लसित और ऊर्जावान होने लगती है । रंग ,उल्लास , गीत ,चारो तरफ एक खूबसूरत सा माहौल दिखने लगता है । मुझे बचपन से ही होली का त्यौहार बेहद पसंद है ।वैसे भी बिहार की होली कुख्यात है । पर होली का त्यौहार वहाँ अपने सुरूर पर होता है । कई दिन पहले से अगजा (होलिका दहन ) के लिए चंदा  इकट्ठा होने लगता । शाम ढप और मंजीरे की धुन पर " फाग" जाये जाने लगते गली गली मोहल्ले मोहल्ले में । जेठ भी वहां देवर बन जाते है होली में ।क्या बुड्ढे क्या जवान सब पर होली का नशा  छाया रहता है । 

रंग उल्लास
ढप मृदंग थाप
झूमे पलाश ।
  जिस मोहल्ले में हम रहते थे वहां  हमारी उम्र के बहुत सारे बच्चे थे हम मिल जुल पुरे मुहल्ले में घर घर जा कर हुडदंग  किया करते थे । मजाल है कोई साफ़ सुधर बच जाये । हमारे बिहार में सुबह गीली होली खेली जाती है और शाम को लोग झकाझक साफ सुथरे नए कपडे पहन कर बड़ो का आशीर्वाद लेते। सभी रिश्तेदारो से मिलने जाते और अबीर की सूखी  होली खेलते है । पुरुष विशेष कर सफ़ेद कुरता पायजामा पहनना पसंद करते है शाम को सूखी  होली खेलते समय । बड़ा ही नयनभिराम और आनंदमय क्षण होते है वे । पुराने शिकवे गीले भुला कर लोग गले मिलते है । एक दूसरे के प्रति  आदर सम्मान का भाव दर्शाते है हँसी ठिठोली का माहौल बना रहता है । चाहे मन न मिलते हो पर गले मिलने में और एक दूसरे को रंगने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते  ये कहते हुए की " बुरा न मानो होली है "

 होली मिलन -
गले लगे पड़ोसी
कृत्रिम रंग



बिहार में पली बढ़ी और शादी हुयी पश्चिम बंगाल के बांकुरा शहर में । वहाँ के त्योहारो के रंग बिहार से अलग  दिखे ।  बंगाली परिवारों में प्रायः होलिका दहन के दिन ही सुबह होली खेल ली जाती है जबकि बिहार में और कई राज्यो में होलिका दहन के दूसरे दिन । बंगाल में मैंने शाम की होली नही देखी । वहां  सुबह ही रंग अबीर सब से होली खेल लेते है । शाम को वहाँ रिश्तेदारो  से मिलने और उनका आशीर्वाद लेने वाली रीत भी मैंने नही देखी । 
ये बात हर साल ही मुझे खटकती थी और मैं बिहार की होली के किस्से सुनाती बच्चो को और परिवार के बाकि सदस्यो को भी ।
 खैर हर देश ,राज्य , समाज ,धर्म और जाति की अपनी विशेषताएं होती हैं जिनका असर त्योहारो पर भी निश्चित रूप से देखने को मिलता है । बिहार और बंगाल से होते हुए  अब मैं पिछले ६ सालो से दिल्ली में रह रही हूँ । यहाँ भी होली का रंग उन दोनों जगहों से जुदा दिखाई दिया । दिल्ली में लोग हर उत्सव को पूरी मस्ती से मनांते है । यहाँ होली दिवाली ढोल नगाड़े की धुन पर लोग अपने परिवार और दोस्तों पड़ोसियों के साथ थिरकते हुए दिख जायेंगे । यहाँ भी वैसे एक बार ही सुबह में होली खेल लेते है लोग और शाम होते ही घूमने फिरने निकल लेते है । जगह जगह होली मिलन का आयोजन होता  दिख जाता है । मंदिरो में भी होली की काफी धूमधाम होती है यहाँ । कुछ आरामपसंद लोग शहर से बाहर परिवार के साथ रिसोर्ट वगैरह  में रहने चले जाते है ।
पर फिर भी यहाँ जो एक बात मुझे खटकती रही वो ये मैं अपने मारवाड़ी समाज का नियम नही पालन कर पायी यहाँ आने के बाद ।   मारवाडी  समाज  में होली के दिन से एक अलग ही आलम होता है घर में । हमारे यहाँ गणगौर की पूजा होली के दिन  से ही शुरू होती है जो की शिव पारवती के प्रतीक माने जाते है । हालाँकि होली की और इस पूजा की तैयारियां शिवरात्रि के बाद से ही शुरू हो जाती है । शिवरात्रि के दूसरे दिन से गाय के गोबर से " बड़कुल्ले " बनाये जाते है । यानि गोबर के छोटे छोटे गोल लोइयां सी बना कर फिर उसमे बीच  में ऊँगली से छेद कर दिया जाता है जैसा की सांबर बड़ा वाले वडा में होता है । रंग भरी एकदशी वाले दिन गोबर से खिलौने , बर्तन , कंघी , खाट , नारियल , सुपारी ,सूरज ,चाँद , होलिका और प्रह्लाद बना कर ,,उनपर  रोली ,आटा , हल्दी ,मेहँदी से सजावट कर दी जाती है जिसे "ढाल  थापना " कहते है ।  फिर होलिका दहन के दिन शुभ मुहूर्त देख कर उनकी ७-११- इस तरह विषम संख्या  में माला बनाई और होलिका दहन से पहले घर के सभी सदस्य उसकी पूजा करते है फिर उन्हें जहाँ होलिका दहन के लिए होली सजी होती है उनमें  डाल  दिया जाता है ।  उसकी फेरी लगायी जाती  है फिर  उसमे से धोड़ी अग्नि घर ले आते है उनपर पापड़ सेक कर प्रसाद ग्रहण करते है फिर सुबह उस राख  से गणगौर की प्रतिमा बनायीं जाती है ।
बड़कुल्ला अब घरो में बनाना कम हो गया है बाजार में मिलने लगे है । आज कल कई कारणों से जैसे शहरो में खटालों की कमी , गाय भैंस अब मिलते नही , औरतो को अब ऑफिस भी जाना पड़ता है तो समय की कमी के कारण  त्योहारो का  भी बाजारीकरण हो गया है ।  पर मुझे दिल्ली में कहीं मिला नही । कुछ लोगो ने बताया की यहाँ मिलता है वहां  मिलता है। .कुछ तो जानते ही नही। .मैंने खोज की  मुझे मिला नही तो अब मैंने वो पूजा छोड़ दी है क्योंकि यहाँ गोबर भी उपलब्ध नही न ही छत है जहाँ पर उसे सुखा  सकूँ । हमारे भतीजा भतीजी जिनका जन्म दिल्ली में ही हुआ वो तो जानते ही नही की बड़कुल्ला क्या होता है । होलिका दहन भी यहाँ हर मोहल्ले में नही होता । बच्चो ने वो सब कुछ नही देखा । मारवाड़ी समाज की इस परंपरा से वो पूरी तरह अनभिज्ञ है । ऐसे में रंग भरी एकादशी के दिन मेरी एक मित्र ने फेसबुक पर बड़कुल्ला की फोटो डाली तो उसे देख वो सब पिछली बाते याद आ गयी । पटना और बांकुरा के दिन याद आ गए । मेरी जैसी कितनी औरतो के साथ हुआ होगा ये । और उस फोटो को लाइक कर के ही वो संतुष्ट  हो गयी होंगी मेरी तरह । मैंने भी बच्चो को दिखायी वो फोटो ।

दादी की चीख ~
बड़कुल्ला की फोटो 
फेसबुक पे 


 होली के दिन से लेकर १८ दिन तक चलने वाला गणगौर पूजा भी स्वरुप बदल कर ही सही अपना अस्तित्व बचाये हुए है । माँ से सुनते थे और बचपन में अपने पास पड़ोस में देखा भी पहले कुंवारी लडकिया ५ साल की उम्र से ये पूजा शुरू कर देती थी । और चाहे बीमार हो या कोई भी अन्य कारन हो पर ये पूजा नही छोड़ती थी । सुबह सुबह उठ टोली बना कर दूर्वा  लाना , फूल लाना, गणगौर के वस्त्र तैयार करना ,फिर सुबह सुबह उनकी पूजा करना , ३-४ घरो की लडकिया किसी एक घर में इकट्ठी हो कर ये पूजा करती । जिस कन्या की शादी हो जाती वो शादी के पहले साल की होली अपने पीहर में आ कर ये पूजा करती । ये उनका अंतिम पूजन होता क्योंकि ये केवल कुंवारी कन्याओ के लिए ही है और अंतिम दिन  सभी सुहागने भी साथ में मिल कर ये पूजा करती है । उस १८ दिन घर में एक उत्सव सा माहौल होता था । जिनके घर बेटी की शादी के बाद वाले साल का पहला गणगौर होता वहां  तो और भी धूमधाम से ये पूजा होती ।नयी शादीसुदा लड़की को सखिया छेड़ छेड़ गीत गाती  सीठना देती । लड़की शर्माती सकुचाती और अपने पति अपनी ससुराल की यादो में खोटी हुयी पूजा करती और पति के पास जल्द से जल्द वापिस जाने की इच्छा मन में दबाये शीघ्र दिन बीतने का इन्जार करती । साजन बिना होली फीकी फीकी लगे पर कहे किसे ! 
 चुभोते शूल
बिन तेरे साजन
टेसू के फूल

सुर्ख कपोल~
गंगौर के गीत में 
पति का नाम 

गंगौर गीत~

पति का नाम लेते
लरजे होठ



 १८ वें दिन  फिर बेटी को ढेर साडी मिठाई वस्त्र इत्यादि दे  विदाई की जाती । पर अब कुंवारी लड़कियों के पास समय नही । अंग्रेजी शिक्षा पद्धति , संयुक्त परिवार के विघटन , सामग्रियों के जुटाने की दिक्कत  बच्चो में पूजा पाठ  के प्रति उदासीनता इत्यादि कारणों से अब ये पूजा केवल १८ वें दिन में ही सिमट कर रह गयी है । हां नवेली व्याहताओ को अब भी इसे  करवाया जाता है पर अब ये जरुरी नही रह गया की वो मायके जा कर ही पूजा करें । आज कल ससुराल वाले ही अपने पास करवा देते ये पूजा । लडकिया अब अपनी पढ़ाई और अपने करियर के प्रति गंभीर हो गयी हैं । प्रायः वो बारहवी के बाद किसी प्रोफेशनल कौर्से की शिक्षा लेती है जिसके लिए वो पि जी  या हॉस्टल में रहती हैं । ऐसे में  व्रत त्यौहार पूजा पाठ घर परिवार से अलग रहकर ही मनाने होते है । तो इन सबसे वो अनजान ही होती हैं ।

बच्चे प्रवासी ~
रंग रही उनको
फोटो शॉप में 


 मेरी बेटी भी जब से मैं दिल्ली आयी हूँ तब से हॉस्टल में ही रहती है । बिना बच्चो के ये सारे त्यौहार बेमानी और फीके लगते है । केवल फ़ोन पर एक दूसरे को बधाई देने तक ही सिमट कर रह गए ये त्यौहार ।अब तो ये घर घर की कहानी बन गयी है । बच्चो की एक अलग दुनिया होती है और माता पिता की अलग । हर त्यौहार पर सब पुराने दिन घेर के बैठ जाते है उन्ही यादो के साथ बतियाते हुए दिन बीत जाते है

गुजरे दिन
रंग जाते है मन
अकेला देख

होली की रंग बिरंगी शुभकामनाये


 
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