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** हेलो जिन्दगी * * तुझसे हूँ रु-ब-रु * * ले चल जहां * *

Tuesday, September 25, 2012

मौन निमंत्रण


आओ आज फिर मिल बैठे ,तुम और हम ,
मेरे अंतर्मन ........
कुछ तुम्हारी सुने कुछ अपनी कहे ,
 बहुत दिन हुए ...तुमसे मिले
सिमट गए तुम कही किसी कोने में
आतुर ..भयभीत ..उपेक्षित ...तिरस्कृत ...

भूल गयी थी .........
तुम्हारी इच्छाएं ..अभिलाषाएं
दफ़न हो गयी थी  ,जगत समुन्दर में
विवश्ताओ की भेट चढ़ा दिए थे तुम 
रिश्तों की खातिर 

मूक आँखों से हर जख्म पीते गए
 जीते गए ...बस जीते गए ..
हाँ ......है ये मेरा ही  स्वार्थ
आज  फुर्सत के चंद  लम्हों में
किया तुझे याद ....


आहत,व्यथित,विवश,रिश्तों से ठगी 
भेज रही हूँ प्रेम सन्देश ..
मेरे अंतर्मन ...
स्वीकार  करो .. मौन निमंत्रण 
आओ आज मिल बैठे
तुम ...और ....हम  !



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