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** हेलो जिन्दगी * * तुझसे हूँ रु-ब-रु * * ले चल जहां * *

Wednesday, February 4, 2015

क्षणिकाये -उगा सूरज , मेरे मन




क्षणिका १ -उगा सूरज
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लो
उगा सूरज
फ़ैल गया उजियारा
कुछ बड़े बड़े
बंद झरोखे वाले घर
सर उठाये खड़े है
प्रतीक्षित
आज भी
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क्षणिका २  - मेरे मन
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 जाओ
खोल दी मुट्ठी
उड़ो
अब
तुम्हारे हौसलों पर निर्भर है
बनोगे तितली
या
छुओगे गगन
मेरे मन





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