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** हेलो जिन्दगी * * तुझसे हूँ रु-ब-रु * * ले चल जहां * *

Thursday, March 26, 2015

मंजिल बाकी है



अभी तो राह  देखी  है मंजिल  बाकी  है
ढली है नींव  ही  केवल मकान बाकी  है ||

 भीड़ में खो नहीं जाना सम्हल चल जरा
जश्न दीवानों का है ये अंजाम  बाकी  है||

 घूम आये मरू गुलशन  पर्वत पर है अब चढ़ना
कसमे बहुत खाली हमने अभी तकरार बाकी है ||

 मंदिर ,मस्जिद  या गिरिजा मिल ही जायेगा खुदा
जहर जीवन का पी ले जो वो  तलाश बाकी है ||

चौखट पर मेरे धूप नही है पनप रहे है बड़ पीपल
छाया बन पाएंगे ये कभी इन्तजार वो बाकी  है ||

खाली प्याले ,चाल सधी है ,प्यास भी मिटी नही ||
मिला जाए कोई साकीबाला अभी तो रात बाकी  है
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