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** हेलो जिन्दगी * * तुझसे हूँ रु-ब-रु * * ले चल जहां * *

Tuesday, January 15, 2013

दर्पण बोला




सोने की थाल 
धुंध  संग संघर्ष

निखरी आभा 




भ्रम  जो टुटा

बिखरे  ख्वाब  सभी
शीशे  के बने




दर्पण बोला

"मै "  ही सबसे बुरा
ढूंढता  कहाँ ??



प्रतिबिंबित

अंतर्मन मैं तेरा
नजर  मिला 




नम  थी  धरा

पत्ते पत्ते पसीजे
नभ जो रोया



जलती रही 
संस्कारो  की चिताएं

देश में मेरे 




नभ के आँसू

सज गए धरा पे
बनके मोती


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