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** हेलो जिन्दगी * * तुझसे हूँ रु-ब-रु * * ले चल जहां * *

Friday, April 26, 2013

दर्पण



पूछने लगा है अब
दर्पण यूँ  मुझसे
खोजते हो किसे अब
तुम यूँ मुझमे
कैसे  दिखाऊ अब
अक्स मैं तेरा
मासूम खून के धब्बे
उभरे इस कदर
लगता है हर चेहरा अब
मुझे दागदार सा
कोमल नाखुनो ने उकेरी
दरार अनगिनत
सुन्दर जिस्म तेरा अब
दिखे विछिन्न सा
खो गयी चमक अब
बेनूर मैं हुआ
देखना हो मुख जब
मन में झांकना
पा जाओ गर खुद को
इतनी दया करना
आइना ये सच का तब
जग को भी दिखा देना









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